Friday, May 22, 2009

कौन बुझाये प्यास


मांग रहा राहगीर पानी
कौन बुझाये प्यास
खाली पड़े कुए, सूख गए तालाब
चातक पक्षी तड़प रहा
आयो न सावन अब की बार
फट्टी दरारे खेतो मे नहीं फसल की अब कोई आश
क्या कोई नहीं ऐशा बुझा सके जो भूमि की प्याश?
भूरे बादल आ गये, है कालो का इन्तिज़ार
नदिया सिमट रही नालो मे कौन बुझाये प्याश
गर्मी - सर्दी दोनों विकराल हुआ मौसम बेहाल


करो धरती पुत्र कोई जतन बुझे जिसे धरा की प्याश
खोद डालो कुए,तालाब,बादल दो मुख नदियों का
लौटा दो कच्ची सतह धरा की सोख ले जो वो पानी
रखो सम्मान इस धरा का ले आओ वो मौसम पहला सा
बरसे बादल घनघोर बुझे धरती की प्याश
गाओ पेड़-पोधे,पक्षी, मनुष्य सब मिलकर एक नया राग-मल्हार


Saturday, May 9, 2009

किसान की जय-जयकार



गाँव- गाँव की एक पहचान

सबसे पहले उठ जाता किसान
खेत- खलिहानों मे करता मेहनत

रहता सदा स्वस्थ और बलवान



इसके जैसी नहीं दूजी मिशाल

भूखा नहीं सोने देता देश को किसान

नहीं कभी सरहद पर फिर भी
छोड़ता नहीं कभी ज़ंग का मैदान



खेत-खलिहानों मे उगा फसल
देता हर जवान का पूरा साथ

प्रकृति देती उसको दोनों हाथो से

ये करता उसका माँ सा सम्मान



भाईचारा धर्म हो जिसका

ईमानदारी मे न कोई तोड़ इसका

नेता करते जिसकी जय-जयकार
भगवान को प्यारा सबसे


शान देखिये उस किसान की

कंधो पर जिसके देश का सम्मान

गाँव- गाँव की एक पहचान

सबसे पहले उठ जाता किसान