
मांग रहा राहगीर पानी
कौन बुझाये प्यास
खाली पड़े कुए, सूख गए तालाब
चातक पक्षी तड़प रहा
आयो न सावन अब की बार
फट्टी दरारे खेतो मे नहीं फसल की अब कोई आश
क्या कोई नहीं ऐशा बुझा सके जो भूमि की प्याश?
भूरे बादल आ गये, है कालो का इन्तिज़ार
नदिया सिमट रही नालो मे कौन बुझाये प्याश
गर्मी - सर्दी दोनों विकराल हुआ मौसम बेहाल

करो धरती पुत्र कोई जतन बुझे जिसे धरा की प्याश
खोद डालो कुए,तालाब,बादल दो मुख नदियों का
लौटा दो कच्ची सतह धरा की सोख ले जो वो पानी
रखो सम्मान इस धरा का ले आओ वो मौसम पहला सा
बरसे बादल घनघोर बुझे धरती की प्याश
गाओ पेड़-पोधे,पक्षी, मनुष्य सब मिलकर एक नया राग-मल्हार

कौन बुझाये प्यास
खाली पड़े कुए, सूख गए तालाब
चातक पक्षी तड़प रहा
आयो न सावन अब की बार
फट्टी दरारे खेतो मे नहीं फसल की अब कोई आश
क्या कोई नहीं ऐशा बुझा सके जो भूमि की प्याश?
भूरे बादल आ गये, है कालो का इन्तिज़ार
नदिया सिमट रही नालो मे कौन बुझाये प्याश
गर्मी - सर्दी दोनों विकराल हुआ मौसम बेहाल

करो धरती पुत्र कोई जतन बुझे जिसे धरा की प्याश
खोद डालो कुए,तालाब,बादल दो मुख नदियों का
लौटा दो कच्ची सतह धरा की सोख ले जो वो पानी
रखो सम्मान इस धरा का ले आओ वो मौसम पहला सा
बरसे बादल घनघोर बुझे धरती की प्याश
गाओ पेड़-पोधे,पक्षी, मनुष्य सब मिलकर एक नया राग-मल्हार

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