Wednesday, April 14, 2010

पंच परमेश्वर



पंचायते
मानव आरम्भ मे अकेला हो ये संभव नहीं हो सकता क्योकि मानव की उत्पति का मूल नियम सभी को पता है ये जरूर है की आरम्भ मे मानव की संख्या दो से लेकर दहाई या सेकडो हो उनमे कुछ कमजोर होंगे कुछ ताकतवर लेकिन अन्य पशु - पक्षियों से बचाव के लिए, सबसे महत्वपूर्ण जीवन के लिए उन्होंने कुछ नियम कायदे बनाये जो पीढ़ी दर पीढ़ी बदलते रहे

आज हम कानून का जो रूप देखते है वो मानव को मानव अधिकार प्रधान करता है लेकिन समय के साथ कुछ मानव समूह अपनी स्वार्थसिद्दी पूरी करने के लिए कानून के रखवाले बन बेठे है जैसे पंच, न्यायधिश, मौलवी अन्य

आज सभी को पता है की यदि आप अदालत मे अपने पक्ष को रखने के लिए जायेंगे तो वहां अदालत को कुछ खर्चे अदा करने होंगे जो हर याचक नहीं कर सकता साथ ही अदालतों मे लगने वाला वक़्त किसी भी निरपराधी को अपराधी की तरह ही भुगतना पड़ता है रही सही कमी अदालतों और सभी सरकारी, गैर सरकारी विभागों मे फैला भ्रस्टाचार पूरी कर देता है अब इंसाफ कहाँ मिले इस खोज का अंत यहीं तो नहीं

पंच (पंचायते) हर घर, परिवार, कुटुंब, समाज अपने बीच मे से कुछ सामाजिक लोगो को इस बात का अधिकार देते है की वो उनके (विवादित) फैसले करे एक दो इंसान किसी का पक्षपात कर सकता है इसलिए वो कम से कम पांच लोगो को ये अधिकार देते है जिससे उनका वक़्त और धन दोनों बच जाते है

जिस प्रकार अदालते झूठे गवाह और नकली सबूतों के आधार पर निरपराध को सजा दे देती है उसी प्रकार कभी इन पंचो से भी गलत फैसले ही जाते हो लेकिन इन्हें नकारा नहीं जा सकता

आजकल इस तरह की पंचायतो पर कुछ आरोप लग रहे जिनमे प्रमुख गोत्र विवाद है
किसी भी गाँव मे अक्सर ये माना जाता है की सभी लड़के लड़की एक दुश्रे को भाई बहन की नज़र से देखगे लेकिन फ़िल्मी चकाचोंध मे कुछ युवा भ्रमित होकर इस रिश्ते को दागदार कर रहे है आप ही सोचे यदि आपके घर आने वाला कोई लड़का या लड़की एक दिन चुपचाप एक दुश्रे के हो जाए या शारीरिक सम्बन्ध बना ले तब कैसा लगेगा ?
इस तरह के कुछ बच्चे अपने जिद और स्वार्थ को पूरा करने के लिए पंचायतो पर आरोप लगा रहे है कुछ माता पिता जिनकी वो इकलोती संतान हो अथवा किसी से जाति दुश्मनी निकालने के लिए भी इस तरह के अपराध मे अपने बच्चो का साथ दे देते है

अंत मे मै केवल इतना ही कहना चाहूंगी की समाज और सरकार दोनों को ही एक दुश्रे की जरूरत है बल्कि समाज या सरकार लोगो के विश्वाश पर ही कायम है यदि एक बार समाज का भरोशा कानून पर से उठ गया तो ........................................?

4 comments:

  1. बबिता जी नमस्कार
    आपके द्वारा उठाया गया मुद्दा आजकल बेहद गर्म है और आपने जिस तरह पंचायतो के पक्ष रखा है वह काबिले तारीफ है मै भी पंचायतो के फेसलो का सम्मान करती हूँ जब पुलिश और वकील मिल कर आम जनता को लूटती है तब ये पंचायते ही उनका सहारा बनती है अब तो पंचायतो मै ५० प्रतिशत महिलाओ को अधिकार भी है इसलिए इसके इंसाफ पर तो कानून को भी टिप्पणी करते हुए सोचना चाहिए नहीं तो इसी तरह अदालतों मै मुकदमो का अम्बार खड़ा रहेगा और इन्साफ और इन्साफ की चाहत उसके निचे दम तोड़ रहोहोगी

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  2. बहुत खूब लिखा है आपने आज आप ही नहीं बल्कि देश की हर महिला पंचायतो मे शामिल है बल्कि बहुत सी जगह तो महिला ही मुख्या सरपंच भी है इसलिए इस संगठन को तोड़ने के उद्देश्य से ही कुछ स्वार्थी तत्व इसे बदनाम करना चाहते है कोई भी विवाद केवल तब पैदा होता जब कोई व्यवस्था के खिलाफ जाता है यहं भी कुछ ऐसा ही है
    आप इसी प्रकार गाँव और ग्रामीण जीवन पर अपने विचार लिखते रहे हम जैसे आपके साथ है

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